बचपन मे मैं अपनी ही दुनिया में खोया रहता था। हर चीज़ के बारे में जानने का शौक़ीन हुआ करता था। मेरे उम्र के बच्चे खेल कूद में लगे रहते थे। लेकिन मैं कुछ अलग ही किस्म का शख्सियत हुआ करता था।
मेरे माँ बाप, मेरी दीदी और .... कुछ गिने चुने दोस्त .... बस यह ही मेरी छोटीसी, अपनीसी, ज़ाती दुनिया थी।
मेरी ये हालत देख़ कर, मेरे पापा कुछ नए दोस्त घर ले आये थे। उनका रंग, रूप, नाप, खुशबू सब अलग था। लेकिन सब मे एक खूबी थी। ..... वो शोर नही मचाते थे। ..... वो चिल्लाते नहीं थे। ..... वो इतना ख़ामोश होते थे की कोई ख़ामोशी का सर्फ़राज़ी हैं। ..... में अपने नए दोस्तों को पसंद करने लगा था। ....क्यों की वो भी मेरे तरह गुमसुम सा .... खोया सा हुआ करते थे।
मेरे इन नए दोस्तों का एक नाम था। .... हाँ। सब का एक ही नाम ..... किताब।
वो आवाज़ तो नहीं करते थे .... लेकिन, मुझ से बात ज़रूर करते थे। में भी उनसे बात करता था।
कई बातें हुए करती थी। अलग अलग सूरत-ओ-शक्ल में ....
कभी कहानियाँ तो कभी पहेलियाँ।
कभी चुटकुले तो कभी हक़ीक़तें।
कभी नज़्में तो कभी कविताएं।
इन बातों से मुझे काफ़ी सारा जानकारी मिलती थी। और में इल्म पा रहा था। …. एक बच्चे के लिए ये एक अनोखा एहसास था। ... बेआवाज़ .... पर शानदार।
जैसे जैसे नए दोस्त आने लगे .... मेरे बातचीत लंबे और गहरे होने लगे थे .... दिन बदले महीनों में और महीने सालों में बदल गए । बातचीत तो जारी थी। पर मज़मू बदल गया था।
कहानी के जगह कादम्बरी, कविताओं के जगह काव्य और प्रबंध। ..... छंद और अलंकार मेरे नए साथी बन गए थे।
अब पहेलियाँ और चुटकुले के लिए दिल में जगह नहीं बची थी।
अब तो सियासत, सिनेमा, कारोबार, खेल क्रीड़ा .... इन मामलात पे दिलचस्पी होने लगी थी।
वेदांत और फलसफा बसीरत का ज़म ज़म बनगए थे।
कुछ साल ऐसे गुज़र गए थे और मैं जवानी से बीच उम्र का होगया था।
खेल और सिनेमा में दिलचस्पी खत्म होगयी थी। सियासत और राजनीती में वो मज़ा नही रही।
एक तन्हाई सी दिल के अंदर छा गई थी।
ठीक उस वक़्त, एक नया दोस्त मेरे दुनिया में कदम रखा था। उसका नाम हैं ..... इतिहास।
सल्तनतों का आना और गिरना, राजमहल के रहस्य, जंग-ओ-जदल, षड्यंत्र, कूटनीती, सिफ़ारिशें, फ़न और तहज़ीब, कला और अदाकारी, संस्कृती .....
इस नया साथी के पास ऐसे कई दिलकश किस्से थे।
हर किस्सा एक सम्मोहक और सन्सनी खेज़ कहानी थी। हर किस्सा मस्ती भरी और मज़ेदार थी।
'इतिहास उबाऊ है' 'तारीख़ से मुझे उकताहट होती है'
ऐसा मेरा सोच हुआ करता था।
'इतिहास एक जोकिम भरी मुहीम है। तारीख़ एक साहस भारी खेल है। एक अनोखी सफ़र है जिसका मंज़िल अंजान है। जो भी हैं, रोमांचक ज़रूर हैं।' .... ऐसा मेरा नया सोच हैं।
'इतिहास का कोई कदर करे भी तो क्यों करे?' .... ऐसा मैं सोचता था।
अब पता चला .... 'इतिहास एक काल यान का जहाज़ है, जो मुझे उस माज़ी में लेजा सकती है जहाँ मैं कभी जा नही पाऊंगा।'
कभी मैं सोचता था की 'इतिहास पढ़ने की ज़रूरत ही क्या है?' 'वो तरीकें याद रखना .... वो सल्तनतों, वो रियासतों का नाम याद रखना .... वो शाही घरानों को रटना' .... इन सब की वजह से इतिहास से मैंने मुह मोढ़ लिया था।
पता चला .... 'इतिहास तो नए संस्कृती, नए तोर-तरीकें, नए रीती-रिवाज़, और नए नए जगाहों से रूबरू कराती है।'
'भिन्न विचारधारा समझाती है। अनपी सोच-विचार को सृजनशील बनाती है। कल्पना शक्ती बढ़ाती है।'
मन-ही-मन में मैं यह ही मानने लगा हूँ।
इतिहास एक त्रिवेणी संगम है। माज़ी, हाल और मुश्ताक़बील .... एक जुट मिलकर .... तारीख़ का किताब बनजाते है।
एक अमरीकी लेखक ने लिखा था ... 'आख़िर इतिहासकार मरीज़ो का इलाज नहीं करता है। दिल के बदले दिल को जोड़ने वाले जराह नहीं है। गुनहगारों को गिरफ़्तार करने वाला सिपाही नहीं है। सड़कें नहीं बनाता है। पुल नहीं बांधता है। .… फिर भी वो अहम इसलिए है क्यों की वो हमें हमारे माज़ी से जोड़ता है। हमारे जड़ों से परवरिश दिलाता है।'
मेरा भी कुछ ऐसा ही एहसास रहा है।
लोग अपने जड़ों से अविभक्त है। जनता, तहज़ीब और तारीख़ का एक पुरानी रिश्ता है।
खुदा करे हुम् अपने माज़ी से कभी जुदा ना हो।
इतिहास पढ़िए। तारीख़ सीखिए। अपने जड़ों से जुड़िये।
पहले कभी मैं तारीख़ से तंग होता था। अब तो मुझे इतिहास से इश्क़ हो गया है।